भारतीय साहित्य की अवधारणा
सारांश (Abstract) भारतीय साहित्य की अवधारणा विश्व साहित्य के इतिहास में एक अनूठी परिघटना
है। जहाँ पश्चिमी साहित्य का वर्गीकरण प्रायः भाषा और राष्ट्र की सीमाओं में बँधा
होता है, वहीं भारतीय साहित्य बहुभाषी होते हुए भी एक अंतर्निहित
एकात्मता का प्रतिनिधित्व करता है। यह शोध आलेख भारतीय साहित्य के मूल ढाँचे,
उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक निरंतरता
और 'विविधता में एकता' के सिद्धांत का
सूक्ष्म विश्लेषण करता है। इसमें यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि भारतीय
साहित्य केवल विभिन्न भाषाओं में रची गई कृतियों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक साझा सांस्कृतिक चेतना और जीवन-मूल्यों की अखंड अभिव्यक्ति
है।
बीज शब्द (Keywords): भारतीय साहित्य, सांस्कृतिक चेतना, विविधता में एकता, भक्ति आंदोलन, लोक और शास्त्र, समन्वयवाद, राष्ट्रीय
अस्मिता।
प्रस्तावना
'भारतीय साहित्य' शब्द का
प्रयोग करते ही हमारे समक्ष अनेक भाषाओं, बोलियों, लिपियों और क्षेत्रीय संस्कृतियों का एक विशाल मानचित्र उभरता है। प्रश्न
उठता है कि क्या 'भारतीय साहित्य' एकवचन
है या बहुवचन? क्या यह अनेक साहित्यों का एक संघ है, या यह एक ही आत्मा है जो अनेक शरीरों (भाषाओं) में निवास करती है?
प्रसिद्ध साहित्य चिंतक डॉ. नगेन्द्र और आचार्य सुनीत कुमार
चटर्जी ने इस बात पर जोर दिया है कि भारतीय साहित्य का अध्ययन केवल भाषाई आधार पर
नहीं, बल्कि उसके भावनात्मक
और वैचारिक आधार पर किया जाना चाहिए। साहित्य अकादमी का आदर्श वाक्य—
"भारतीय साहित्य एक है, यद्यपि वह अनेक
भाषाओं में लिखा गया है" —इस अवधारणा का मूल मंत्र है।
भारतीय साहित्य की अवधारणा पाश्चात्य साहित्य की अवधारणा से
भिन्न है। पश्चिम में साहित्य (Literature) अक्सर 'लिखित शब्द' तक सीमित
रहा है और वह व्यक्ति-केन्द्रित (Individualistic) रहा है।
इसके विपरीत, भारतीय परंपरा में 'साहित्य'
का अर्थ 'सहित होने का भाव' है—अर्थात् शब्द और अर्थ का सहभाव, तथा मनुष्य का समष्टि (ब्रह्मांड) के साथ सहभाव। अतः भारतीय साहित्य की
अवधारणा का मूल आधार 'समन्वय' और 'सह-अस्तित्व' है।
भारतीय साहित्य का दार्शनिक और
सांस्कृतिक आधार
भारतीय साहित्य की अवधारणा को समझने के लिए हमें उन सूत्रों को
पकड़ना होगा जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक के जनमानस को जोड़ते हैं। भाषाएँ अलग होने
के बावजूद, भारतीय साहित्य की
विचार-भूमि (Thought-Process) एक समान रही है।
1. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का समन्वय प्राचीन काल से ही भारतीय साहित्य का उद्देश्य
केवल मनोरंजन नहीं रहा है। संस्कृत के महाकाव्यों (रामायण, महाभारत)
से लेकर तमिल के 'शिलप्पदिकारम' तक,
साहित्य का उद्देश्य 'पुरुषार्थ चतुष्टय'
की प्राप्ति रहा है।
Ø रामायण हमें ‘धर्म’ (कर्तव्य) और मर्यादा सिखाती है।
Ø महाभारत जीवन के संघर्षों और कर्म (अर्थ और काम) की जटिलताओं
को दर्शाता है।
Ø उपनिषद और बाद के संत साहित्य ‘मोक्ष’ की राह दिखाते हैं।
यह जीवन-दृष्टि भारतीय साहित्य को एक सूत्र में पिरोती है। जब
एक मराठी पाठक 'ज्ञानेश्वरी' पढ़ता है और एक हिंदी पाठक 'मानस', तो दोनों की भाषा अलग होती है, किन्तु जीवन-मूल्य
(त्याग, सत्य, करुणा) एक ही होते हैं।
2 लोक और शास्त्र का अद्वैत भारतीय साहित्य की
एक प्रमुख विशेषता 'लोक' (Folk) और 'शास्त्र' (Classical) के बीच का निरंतर संवाद है।
अन्य सभ्यताओं में अभिजात्य साहित्य और लोक साहित्य के बीच गहरी खाई होती है,
लेकिन भारत में यह सीमा रेखा बहुत धुंधली है। वाल्मीकि की रामायण
(शास्त्र) लोक में जाकर लोकगीत बन जाती है, और लोक में
प्रचलित कथाएँ कालिदास या भास के नाटकों का आधार बन जाती हैं। यह 'आवागमन' भारतीय साहित्य की प्राणवायु है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: निरंतरता और
बदलाव
भारतीय साहित्य की अवधारणा स्थिर नहीं है; यह एक बहती हुई नदी के समान है। कालखंडों के
अनुसार इसके रूप बदले, किन्तु आत्मा वही रही।
1 प्राचीन काल: श्रुति और स्मृति की परंपरा प्रारंभ
में भारतीय साहित्य वाचिक (Oral) था। वेद, उपनिषद और जातक कथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर संरक्षित की गईं। इस दौर में
साहित्य का स्वर 'ब्रह्मांडीय' और 'नैतिक' था। यहाँ साहित्यकार का 'अहं' गौण था; रचना
महत्त्वपूर्ण थी।
2 मध्यकाल: भावात्मक एकता का स्वर्ण युग (भक्ति
आंदोलन) भारतीय साहित्य की अवधारणा को सबसे सशक्त रूप मध्यकाल (भक्ति आंदोलन) में
मिला। यह भारत का पहला अखिल भारतीय साहित्यिक आंदोलन था।
Ø दक्षिण में आलवार-नायनार संतों ने जिस भक्ति की मशाल जलाई, वह उत्तर में कबीर, सूर,
तुलसी तक पहुँची।
Ø पूर्व में चैतन्य महाप्रभु और पश्चिम में नरसी मेहता व तुकाराम।
Ø पंजाब में गुरु नानक देव।
इन सभी ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं में लिखा, लेकिन सबका स्वर एक था—ईश्वर
के प्रति समर्पण, जाति-पांति का विरोध और मानवता का सम्मान।
यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय साहित्य भौगोलिक सीमाओं को लांघकर एक 'साझा सांस्कृतिक क्षेत्र' का निर्माण करता है।
3. आधुनिक काल: राष्ट्रीय चेतना और यथार्थवाद अंग्रेजों
के आगमन और आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय साहित्य की अवधारणा में नया मोड़ आया। 1857
के बाद साहित्य 'देवता' से
हटकर 'मनुष्य' पर केन्द्रित हो गया।
Ø रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुब्रह्मण्यम भारती, प्रेमचंद, फकीर मोहन सेनापति और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे रचनाकारों ने साहित्य को 'राष्ट्रीय जागरण' का हथियार बनाया।
Ø इस दौर में 'उपन्यास' और 'कहानी' जैसी विधाओं ने पूरे भारत में एक साथ जन्म लिया। 'गोदान'
(हिंदी) का होरी और 'छह माण आठ गुंठ' (उड़िया) का मंगराज—दोनों भारतीय किसान की एक ही पीड़ा
को व्यक्त करते हैं।
विविधता में एकता: भारतीय साहित्य का
समाजशास्त्र
भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती और शक्ति उसकी भाषाई
विविधता है। लेकिन यह विविधता बाधक नहीं, बल्कि साधक है।
1. रामायण और महाभारत: जोड़ने वाली कड़ियाँ रामकथा
और कृष्णकथा भारतीय साहित्य की धमनियों में बहने वाले रक्त के समान हैं। डॉ.
रामविलास शर्मा के अनुसार, "रामायण और महाभारत ने भारत
की विभिन्न जातियों और भाषाओं को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधे रखा है।" चाहे
वह असमिया की रामायण हो, बंगला की कृत्तिवास रामायण हो या
जैन रामायण—मूल कथानक में स्थानीय रंगों का समावेश करके हर
क्षेत्र ने इसे अपना बना लिया। यह 'स्वीकरण'
(Adaptation) ही भारतीयता है।
2. अनुवाद की भूमिका भारतीय साहित्य की अवधारणा 'अनुवाद' पर टिकी है। प्राचीन काल में संस्कृत और
पाली से, मध्यकाल में फारसी और प्राकृत से, और आधुनिक काल में हिंदी और अंग्रेजी के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान
हुआ। आज एक कन्नड़ लेखक (जैसे यू.आर. अनंतमूर्ति) की कृति हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद
के माध्यम से पूरे भारत में पढ़ी जाती है और उसे 'कन्नड़
साहित्य' के बजाय 'भारतीय साहित्य'
का दर्जा मिलता है।
समकालीन विमर्श: हाशिए का स्वर
स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1980 के बाद, भारतीय
साहित्य की अवधारणा और विस्तृत हुई है। अब यह केवल सवर्ण या अभिजात्य वर्ग का
साहित्य नहीं रहा।
Ø दलित साहित्य: मराठी से शुरू होकर हिंदी, तमिल और कन्नड़ तक फैले दलित साहित्य ने भारतीय
समाज के दमित सच को उजागर किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन'
हो या शरणकुमार लिंबाले की रचनाएँ—ये सभी एक
साझा दर्द (Pain) और प्रतिरोध (Resistance) की भाषा बोलते हैं।
Ø स्त्री विमर्श: भारतीय साहित्य में अब स्त्रियों ने अपनी 'स्व' (Self) की तलाश शुरू
कर दी है। महाश्वेता देवी, कृष्णा सोबती से लेकर समकालीन
लेखिकाओं तक, यह स्वर पूरे देश में गूँज रहा है।
अतः आज भारतीय साहित्य की अवधारणा में 'अस्मिता' (Identity) और 'न्याय' (Justice) के प्रश्न केंद्रीय भूमिका निभा
रहे हैं।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'भारतीय साहित्य' कोई
यांत्रिक ढांचा नहीं, बल्कि एक 'जैविक
इकाई' (Organic Unity) है। यह एक ऐसी सभ्यता का दस्तावेज है
जो हज़ारों वर्षों से संवाद, संघर्ष और समन्वय की प्रक्रिया
से गुजर रही है।
भारतीय साहित्य की अवधारणा को तीन मुख्य बिंदुओं में समेटा जा
सकता है:
1.
संवेदना
की एकता: भाषाएँ भिन्न हैं, पर सुख-दुःख, प्रेम और करुणा की अभिव्यक्ति समान है।
2.
सांस्कृतिक
निरंतरता: वेद से लेकर आधुनिक कविता तक एक अटूट परंपरा विद्यमान है।
3.
वैश्विक
दृष्टि: भारतीय साहित्य 'वसुधैव कुटुम्बकम'
की भावना के साथ विश्व से संवाद करता है।
अंततः,
भारतीय साहित्य एक विशाल बरगद के वृक्ष की भांति है, जिसकी जड़ें (संस्कृति) एक हैं, तना (भारतीयता) एक है,
किन्तु शाखाएँ (भाषाएँ) अनेक दिशाओं में फैलकर उसे भव्यता प्रदान
करती हैं। भविष्य में भी यह साहित्य अपनी इसी समावेशी प्रवृत्ति के कारण विश्व
साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाए रखेगा।
संदर्भ सूची (References)
1.
नागेंद्र, डॉ. (संपा.) - भारतीय साहित्य का इतिहास,
मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली।
2.
सिंह, नामवर - भारतीय साहित्य की पहचान, राजकमल प्रकाशन।
3.
अयंगर, के.आर. श्रीनिवास - Indian Writing in
English (संदर्भित), स्टर्लिंग पब्लिशर्स।
4.
शर्मा, रामविलास - भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश,
किताबघर।
5.
साहित्य
अकादमी - भारतीय साहित्य (पत्रिका) के विविध अंक।